ARCHITECTS OF THE IMAGINATION.
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जन्म 1954 अब तक 4 उपन्यास, 3 कहानी-संग्रह, 1 व्यंग्य-संग्रह, 4 ग़ज़ल-संग्रह, 3 कविता-संग्रह, 1 गीत-संग्रह, 1 क्षणिका-संग्रह और कविताओं पर 1 समीक्षा-पुस्तक प्रकाशित। उपन्यास "इतिसिद्धम" की पाण्डुलिपि 1987 में वाणी प्रकाशन द्वारा "प्रेमचंद महेश पुरस्कार" से सम्मानित और पुरस्कृत तथा 1988 में प्रकाशित । इसके अतिरिक्त समय-समय पर अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित। बाल-साहित्य लेखन में भी गतिशील। कुछ बाल-कविता/कहानी संकलनों में रचनाएँ संकलित। कक्षा-5 की एक पाठ्य-पुस्तक में चार कहानियाँ और एक कविता सम्मिलित। देश भर की प्रतिष्ठित 150 से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में अनेक बार असंख्य रचनाएँ प्रकाशित। दो दर्जन से अधिक नेट-पत्रिकाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित
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Laxmi Kant Shukkla is an Indian author and storyteller with a deep passion for epic narratives rooted in history, mythology, and royal intrigue. His writing blends ancient civilizations, fictional kingdoms, and intense human drama, creating richly imagined worlds that resonate with contemporary audiences. With a strong inclination toward cinematic storytelling, Laxmi Kant’s work naturally lends itself to visual adaptation, particularly in the genres of historical fiction, mythic thrillers, and grand royal sagas. His novel Devalika reflects his vision of crafting layered characters, powerful conflicts, and emotionally driven plots set against majestic, timeless backdrops. Driven by the dream of seeing Indian historical and mythological stories presented on a global OTT stage, Laxmi Kant Shukkla continues to develop original narratives with the potential to evolve into web series and feature films. His work aims to revive the grandeur of ancient storytelling while connecting it to modern sensibilities.
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सर्वप्रथम 1991 में लिखना आरंभ किया, अक्टूबर 1992 में पहली कहानी ‘एक और निर्मला’ मनोरमा में प्रकाशित हुई। तत्पश्चात् अनेकानेक कहानियाँ एवं लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कहानी ‘ये माँ की गोद नहीं है’ पर अमृतसर खालसा विश्वविद्यालय की छात्रा द्वारा शोध प्रबंध। कहानी गोष्ठियों में भी कई कहानी चर्चित हुई, गद्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन काव्य गोष्ठियों में काव्य-पाठ, आकाशवाणी प्रयागराज से भेंटवार्ता का प्रसारण, अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय स्तर का सम्मान, साहित्य भूषण, मानद आदि उपाधियाँ प्राप्त, हिन्दुस्तानी एकेडमी प्रयागराज द्वारा सम्मानित। ऑनलाइन समीक्षक, कहानी, कविता-पाठ। अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कुछ प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं, कुछ पर काम चल रहा है। हिन्दुस्तान समाचार-पत्र में महिला दिवस पर प्रयागराज के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी महिलाओं में नाम। अखिल भारतीय हिन्दी महासभा के प्रयागराज प्रांत की उपाध्यक्ष शहर समता विचार-मंच की संरक्षक तथा शलभ संस्था की उपाध्यक्ष, समन्वय, सुरभि संस्था की सदस्य।
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नीना अंदौत्रा समकालीन हिंदी साहित्य की एक संवेदनशील और सशक्त रचनाकार हैं। उनका लेखन जीवन, समाज और मनुष्य के भीतर चलने वाले सूक्ष्म द्वंद्वों को गहरे मानवीय सरोकारों के साथ अभिव्यक्त करता है। उन्होंने हिंदी साहित्य और समाजशास्त्र में एम.ए., बी.एड. की शिक्षा प्राप्त की है तथा फैशन डिजाइनिंग में भी औपचारिक प्रशिक्षण लिया है। यह बहुआयामी शैक्षिक पृष्ठभूमि उनके रचनात्मक संसार को व्यापक दृष्टि और गहराई प्रदान करती है। वर्तमान में वे अहमदाबाद में एक स्कूल शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं और साथ-साथ स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं। अध्यापन और लेखन, दोनों ही क्षेत्रों में उनका जुड़ाव समाज के यथार्थ, स्त्री-अनुभवों, संवेदनाओं और मानवीय संबंधों से गहरे स्तर पर दिखाई देता है। नीना अंदौत्रा के अब तक प्रकाशित साहित्य में दो उपन्यास - बेदख़ल और सरोरूह, दो कहानी संग्रह- बिंदलू और कूड़कू दाना, तथा एक काव्य संग्रह "सुलगता गुलमोहर" शामिल हैं। उनकी कहानियाँ और कविताएँ देश की अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके लेखन की विशेषता यह है कि वे सामान्य जीवन की घटनाओं में छिपे असामान्य भावों, चुप्पियों और संघर्षों को अत्यंत सादगी लेकिन प्रभावपूर्ण भाषा में उकेरती हैं। उनकी कई कहानियों का पंजाबी भाषा में अनुवाद भी हो चुका है, जो उनके साहित्य की व्यापक स्वीकृति और भाषायी सीमाओं के पार पहुँच को दर्शाता है। नीना अंदौत्रा का लेखन भीतर तक उतरने वाली अनुभूति का साहित्य है, जो पाठक को सोचने, ठहरने और स्वयं से संवाद करने के लिए प्रेरित करता है। "सुलगता गुलमोहर" सुलगता गुलमोहर एक ऐसा काव्य संग्रह है जिसमें जीवन की विविध भावनाएँ अपनी पूरी तीव्रता के साथ उपस्थित हैं। यहाँ प्रेम है, पीड़ा है, असहज प्रश्न हैं, सामाजिक विडंबनाएँ हैं और साथ ही उम्मीद की कोमल आहट भी। इन कविताओं का जन्म एक संवेदनशील मन की उस बेचैनी से हुआ है, जो अपने आसपास की असमानताओं, चुप हिंसाओं और मानवीय टूटन को देखकर विचलित हो उठता है। सुलगता गुलमोहर की कविताएँ किसी एक भाव या विषय तक सीमित नहीं हैं, ये जीवन की पूरी परिधि को छूती हैं। यह वह कविता है जो हर व्यक्ति के भीतर कभी सुलगती आग बनती है, तो कभी खिलते गुलमोहर की तरह रंग बिखेर देती है।
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मेरठ निवासी लेखिका पूनम मनु समकालीन हिंदी कथा साहित्य में एक सामाजिक यथार्थवादी और संवेदनशील कथाकार के रूप में अपनी अलग पहचान रखती हैं। उनकी कहानियों की जड़ें समाज की उसी मिट्टी में हैं, जहाँ सामान्य मनुष्य रोज़मर्रा के संघर्षों, रिश्तों की जटिलताओं और अपने भीतर चलने वाले द्वंद्वों के साथ जीवन जीता है। वे स्त्री अनुभवों को किसी वैचारिक घोषणा की तरह नहीं, बल्कि उनके नैसर्गिक गुणों—संवेदना, जिजीविषा, विवशता और आत्मसम्मान के साथ प्रस्तुत करती हैं। उनका लेखन समाज को बाहर से देखने का प्रयास नहीं करता, बल्कि भीतर से महसूस करता है। इसलिए उनकी कहानियों में स्त्री केवल पीड़ित या विद्रोही नहीं, बल्कि सोचने, निर्णय लेने और परिस्थितियों से जूझने वाली एक संपूर्ण मनुष्य के रूप में उपस्थित होती है। पारिवारिक संबंध, सामाजिक दबाव, आर्थिक असमानता, पुरुष वर्चस्व, अकेलापन, उम्मीद और टूटन—ये सभी तत्व उनकी कथा-भूमि में स्वाभाविक रूप से समाए हुए मिलते हैं। पूनम मनु की कहानियाँ किसी एक विषय तक सीमित नहीं रहतीं। वे समाज, रिश्ते, संघर्ष और स्त्री अनुभव, इन सभी आयामों को समान गंभीरता से छूती हैं। उनका कथ्य सादा होते हुए भी गहरे अर्थों से भरा होता है। भाषा में अनावश्यक अलंकरण नहीं, बल्कि ऐसी सहजता है जो पाठक को कथा के भीतर खींच लेती है। संवादों और स्थितियों में जीवन की वास्तविक धड़कन सुनाई देती है। उनका लेखन यह विश्वास जगाता है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्यता का दस्तावेज़ भी है। वे बिना उपदेश दिए, बिना शोर मचाए, पाठक को सोचने के लिए विवश करती हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ पढ़ने के बाद भी मन में देर तक ठहरती हैं और पाठक अपने आसपास के समाज को नए दृष्टिकोण से देखने लगता है।
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प्रभात गोस्वामी, व्यंग्यकार, खेल कमेंटेटर, पॉडकास्टर हैं । आप अनेक सालों से व्यंग्य लेखन में सक्रिय हैं। अब तक 6 व्यंग्य व्यंग्य संग्रह, रेडियो प्रसारण पर एक किताब - ध्वनि चित्रों का इंद्रधनुष, रेडियो प्रसारण के बदलते आयाम,इंक प्रकाशन, प्रयागराज से प्रकाशित हो चुकी है। विगत 45 सालों से रेडियो प्रसारण एवं कमेंट्री के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। देश के प्रमुख क्रिकेट टूर्नामेंटों के साथ टैस्ट मैच, एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों, टी 20 क्रिकेट मैचों में कमेंट्री करते हैं। इसके अलावा हॉकी, फुटबॉल, कबड्डी जैसे राष्ट्रीय खेलों की कमेंट्री भी कर चुके हैं। आपके व्यंग्य देश के सुपरिचित समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। आप फेसबुक,इंस्टाग्राम, एक्स से जुड़े हुए हैं। ध्वनि चित्रों का इंद्रधनुष पुस्तक अपना देश एवं दुनिया में रेडियो प्रसारण के इतिहास , आमजन के विकास में इस माध्यम से हुए बदलाव , देश प्रदेश के विकास में रेडियो प्रसारण के महत्त्वपूर्ण योगदानों को रेखांकित किया है। इस किताब में गोस्वामी ने रेडियो प्रसारण और खेल कमेंट्री के कुछ महत्वपूर्ण संस्मरण भी लिखे हैं। साथ ही अपने उद्भव से अब तक रेडियो प्रसारण के बदलते आयामों को रेखांकित किया है। यह पुस्तक पत्रकारिता एवं जनसंपर्क के विद्यार्थियों के लिए लाभदायक है। साथ ही आम श्रोताओं को भी प्रसारण की इस अनूठी दुनिया से रूबरू होने के अवसर प्रदान करती है। आज जब आकाशवाणी देश में रेडियो प्रसारण के 90 वर्ष के अवसर पर उत्सव मना रही है। ऐसे में उनकी पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण यात्रा की जानकारी देती है।
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रागिनी चतुर्वेदी ब्रज संस्कृति, लोकगीत एवं लोकगाथाओं सशक्त साधिका, सुप्रसिद्ध गायिका और लेखिका हैं। आपका जन्म 17 नवम्बर 1959 को मैनपुरी (उ0प्र0) में हुआ। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं समाज-सेवी परिवार में पली-बढ़ी रागिनी जी ने हिन्दी साहित्य एवं राजनीति शास्त्र में पर स्नातक उपाधि प्राप्त की तथा संगीत गायन में प्रभाकर की शिक्षा ग्रहण की। आप आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की बी0 हाई श्रेणी की स्थापित गायिका रही हैं। ब्रज लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के प्रति आपकी विशेष प्रतिबद्धता रही हैं। संस्कृति मंगालय भारत सरकार के अन्तर्गत सी0सी0 आर0टी0 द्वारा वरिष्ठ फेलोशिप प्राप्त करके आपने ब्रज की ‘लोकगाथायें आज के परिपेक्ष्य में’ विषय पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किया। आपकी कृतियां ब्रज के संस्कार गीत, ‘ब्रज के मौसम गीत और लोकोत्सव तथा ब्रज की ‘लोकगाथाओं का सार्वकालिक स्वरूप’ लोक धरोहर को समकालीन दृष्टि से प्रस्तुत करती हैं। विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा सम्मानित रागिनी चतुर्वेदी का सृजन ब्रज की मिट्टी की सुगन्ध, लोकजीवन की संवेदना और सांस्कृतिक चेतना का संजीव दस्तावेज हैं।
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रश्मि वैभव गर्ग एक नवोदित लेखिका हैं,जिनकी रचनाएँ विविध साहित्यिक मंचों पर सराही गई हैं। कोटा (राजस्थान) की निवासी रश्मि ने एम.एससी. (केमिस्ट्री) और एम.ए. (इंग्लिश) की शिक्षा प्राप्त की और साहित्य में अपनी पहचान बनाई। उनकी कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें राजस्थान पत्रिका,मधुरिमा, जनसत्ता, अहा जिंदगी, पंजाब केसरी, , मेरी सहेलीऔर क़िस्सा कोताह , अमर उजाला, हरिभूमि , गृहलक्ष्मी, गृहशोभा जैसी प्रतिष्ठित समाचार पत्र व पत्रिकाएँ शामिल हैं। रश्मि की साहित्यिक उपलब्धियों में प्रमुख हैं: - केशवी कहानी के लिए 2023 में प्रतिलिपि द्वारा तृतीय पुरस्कार - काँची कहानी को गोपाल राम गहमरी प्रीतियोगिता में तृतीय पुरस्कार - समरस साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित प्रश्नोत्तरी में प्रथम स्थान प्राप्त किया । - पर्यटन प्रतियोगिता ( प्रभात सिंगल कोटा) द्वारा आयोजित में प्रथम स्थान । - रोटी की क़ीमत कहानी को हमरंग फाउंडेशन द्वारा विशेष पुरस्कार - नई बहु और टूटती साँसें जैसी कहानियाँ, जिन्हें 2024 में काव्य कुमुद ग्रुप द्वारा सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिला। - प्रेमसुख कहानी को गृहलक्ष्मी श्रेष्ठ कहानी में चुना गया है। - STN चैनल पर इंटरव्यू प्रसारित - वनिता पत्रिका में परिचय प्रकाशित । - आकाशवाणी में भी स्वरचित कविताओं का काव्य पाठ किया था। - रश्मि गर्ग का नाम राजस्थान के साहित्य साधक पुस्तक में भी है, जिसमें राजस्थान के 62 साहित्य कारों का परिचय है । कई साझा संकलनों में उनकी कविताएँ शामिल हैं। कई साहित्यिक मंच जैसे साहित्य की बात विदिशा, समरस साहित्य संस्थान गुजरात,आर्यन लेखिका मंच कोटा आदि मंचों से जुड़कर उन्होंने साहित्यिक कार्यक्रम में भागीदारी की है । हाल ही में उन्हें समरस संस्थान ने प्रश्नोत्तरी में प्रथम स्थान के लिए पुरस्कृत किया । रश्मि का लेखन न केवल भावनात्मक गहराई से भरपूर होता है, बल्कि समाज और जीवन के विविध पहलुओं को भी प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करता है।
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सन् 1974 से विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, लघुकथाओं, लेख, संस्मकरण, साक्षात्कार, समीक्षाएं, प्रेरक प्रसगों, बाल कहानियाँ, ऐतिहासिक लेखों का निरंतर प्रकाशन । आकाशवाणी से कहानियों का प्रसारण। ओशो वर्ल्ड पत्रिका नई दिल्ली से ओशो का संस्मरण प्रकाशित। कहानी एवं लघुकथाओं में मैंने देश-प्रेम, गंगा जमुनी तहजीब, गरीबों के प्रति सहानुभूति, ईमानदारी, खुद्दारी, एक ईश्वर का वोध, शिक्षाप्रद लघु कथाएँ, ज़िंदा एवं मरे व्यक्तियों में फ़रिश्ते के दर्शन करना, सभी धर्मो के कुछ लोग देश को नुकसान पहुंचाने में लगे हैं। व्यंग, तर्क, त्याग, प्रेरक प्रसंग, संकीर्ण मानसिकता, आतंकवाद, राष्ट्रप्रेम आदि का समावेश है।
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मैं सौरभ शर्मा, नई दिल्ली में बसी पुरानी दिल्ली का निवासी, गालिब, जाैक, जफर की गलियों का घुमंतू, पसंद है मुझे किस्से, कहानियां, कविता, शेर ओ शायरियां, सुनना भी और लिखना भी, सच कहूँ तो इन्हीं में जीना भी, सुबह की पहली किरण से, ऑफ़िस की टेबल से लेकर खाने की मेज तक, जागते ख्यालों से लेकर, मीठे सपनों तक, कविताओं में उलझे रहना पसंद है मुझे| मेरी पहली किताब, जो बेहद प्यारी है मुझे, इस किताब में बस प्रेम लिखा है मैंने, जो उसकी बिखरी लटो से किया मैंने, हर कविता में बस उसे ही उकेरा है मैंने, उसे ही तराशा है हर शब्द में मैंने, उसके लिए मेरे प्रेम का तोहफ़ा है ये किताब....
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मैं कहानियाँ लिखती हूँ क्योंकि कहानी मानव जीवन का स्पंदन होती है। आम तौर पर साधारण से दिखाई देने वाले व्यक्ति के संघर्ष, संवेदनाएँ और सपने असाधारण होते हैं। मानव जीवन के रिश्तों की जटिलता, स्त्री मन के अंतर्द्वंद्व और मनुष्य की मौन पीड़ाएँ मेरी कहानियों का आधार हैं। संवेदनशील होने के कारण मन उन सब भावनाओं की गहराई को समझ पाता है जो ऊपर से तो शांत लगतीं हैं किंतु अंदर से उनमें ज्वार भाटा उठ रहा होता है। यही भावनाएं जब कागज़ पर उकेरी जाती हैं तो वो कहानियां बन जाती हैं। मानस्विनी ( डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित मेरी पहली किताब) इस किताब की अधिकांश कहानियां नारी जीवन के संघर्ष की कथाएं हैं, परन्तु वे सशक्त महिलाएं हैं जो अपनी शर्तों पर जीवन जीती हैं। भूली बिसरी धरोहर ( इंक पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित मेरी दूसरी किताब) इस किताब में बृज मंडल में गाई जाने वाली लोक गाथाओं में वर्णित कहानियां हैं। बृज गीत, संगीत और रास की भूमि है। यहाँ अनेक प्रकार की लोक गाथाएँ परंपरागत रूप से गाई जाती रही हैं। दुर्भाग्यवश आज न तो इन गाथाओं को गाने वाले लोग शेष बचे हैं और न ही इन्हें सुनने वाले। परिणामस्वरूप ये लोक गाथाएँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं। इन्हीं लोक गाथाओं के संरक्षण के उद्देश्य से मैंने इन्हें रोचक कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक लोक गाथाओं का अनुवाद मात्र नहीं है। कथाओं में रोचकता और प्रवाह बनाए रखने हेतु कुछ छोटे-छोटे परिवर्तन अवश्य किए गए हैं, किंतु गाथाओं के मूल तत्व और भाव को सुरक्षित रखने का पूर्ण प्रयास किया गया है। पुस्तक की भाषा सहज है, शैली कथात्मक है और कहानियों को अनावश्यक विस्तार नहीं दिया है। मेरा प्रयास है कि ये कहानियाँ हमारी नई पीढ़ी तक पहुँचें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हमारी समृद्ध लोक सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें। मेरे इस प्रयास में इंक पब्लिकेशन और श्री दिनेश कुशवाहा जी का बहुत बहुत आभार। उनका पूरा सहयोग मुझे मिला। अन्यथा मेरे लिए यह एक असंभव सा कार्य था। इस कार्य को पूरा करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मेरी इस छोटी सी लेखन यात्रा में मैं आप सभी के स्नेह और आशीर्वाद की कामना करती हूं।
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सोनू चौहान की कहानियाँ यथार्थवादी और जमीन से जुड़ी कहानियाँ हैं। इनको पढ़ के ऐसा प्रतीत होता है कि कहानी के पात्र शायद आस-पास ही हैं या हम में से कोई है। यह तेज-तर्रार युवा पीढ़ी की कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि एक मध्यवर्गीय परिवारों की कहानियाँ हैं, जो कहीं से भी काल्पनिक नहीं लगती और पाठक स्वयं को इससे जुड़ा हुआ महसूस करता है। अधिकतर कहानियाँ गाँवों और कस्बों की हैं, मगर उसमें मानव की संवेदनाओं और उनके सुख-दुःख का भली-भाँति चित्रण किया गया है। प्रकाशित कृतियाँ: - कहानी संग्रह - 1 - ‘दो लोटा छाछ’, 2 - ‘माँ की निशानी’ 3 - ‘दादी का आँगन’, 4 - ‘अपना कौन?’, 5 - ‘बाँझ’, 6 - ‘वतन की मिट्टी’, 7 - ‘सायर का घर’, 8 - ‘मेरी चन्द कहानियाँ’, 9 - ‘राधा के बेर’, 10 - ‘करवाचौथ’, 11 - ‘बेटियाँ’। काव्य संग्रह: शहर मेरा हिसार बाल साहित्य: कुकी (बालगीत) अन्य: सोनू चौहान की रसोई साझा कहानी संग्रह: नई लेखनी नया सृजन, कहानी मेरी कलम से। साझा काव्य संग्रह: ख़्वाहिशें अभी और भी हैं, अनकहे शब्द, मातृभूमि।
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