ARCHITECTS OF THE IMAGINATION.
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मेरे आदर्श, मेरे प्रेरणाश्रोत, मेरे पिता जी, स्वर्गीय शम्भू प्रसाद सिंह! पूज्यनीय माता जी! हम दो बहन, दो भाई! दुर्भाग्यवश, छोटी बहन अब इस संसार में नहीं! तेरह-चौदह वर्ष की आयु से 'माॅं सरस्वती' के आशीर्वाद स्वरूप, लेखनी से जुड़ाव! अंतिम श्वाॅंसों तक जुड़ा रहने की अंतिम इच्छा! उपन्यास लेखनी से विशेष लगाव! पहला लिखित उपन्यास टूटा दिल प्रत्येक विधा में लिखते रहने का प्रयास! इंक पब्लिकेशन, प्रयागराज से प्रकाशित- उपन्यास! ग़ज़ल संग्रह! कविता संग्रह! कहानी संग्रह! नाटक! प्रकाशक- दिनेश कुशवाहा जी से विशेष लगाव! स्क्रीनप्ले लिखने का भी निरन्तर प्रयास! एक लघु फ़िल्म ये कहाॅं जा रहे हम यूट्यूब चैनल के श्रेया मोशन पिक्चर पर प्रदर्शित! दूसरी लघु फ़िल्म लालच शीघ्र प्रदर्शित! हिन्दी फ़िल्मों के लिये लिखना मेरा स्वप्न! लोगों की खुशियों में ख़ुशी तलाशना और लम्हों में जीना मेरा स्वभाव!
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चिकित्सा स्नातक, एम.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार मूलतः लेखक, कथाकार कवि। 1975 से लेखन एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में निरन्तर सक्रिय। अब तक असंख्य गजलें/कविताएँ लगभग 300 चर्चित प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं (जन दिशा, अक्षर शिल्पी, देशकाल, सम्पदा, इस्पात, भारती, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, अक्षर, पर्व, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, वीणा, संप्रेषण, प्रयास, गाँव का जीवन, दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक नव भारत टाइम्स, दैनिक राँची एक्सप्रेस, दैनिक आज, प्रदीप, जागृति, हस्ताँकन गरिमा भारती राष्ट्र धर्म, अंचल भारती, सुरभि समग्र, वैचारिक संकलन, श्री अरविन्द कर्मधारा, भारतीय रेल) में प्रकाशित। एक काव्य संग्रह- शब्द इतिहास नहीं रचते, राजभाषा विभाग, बिहार सरकार द्वारा अनुदान राशि से सम्मानित। मुस्लिम समाज का सच (आलेख संग्रह) पत्थर हुए लोग (कहानी संग्रह) प्रकाशित। स्त्री नहीं प्रकृति हो तुम/हाशिए का सच, काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन। अनेक काव्य संकलनों में कविताएँ चयनित तथा आकाशवाणी पटना से प्रसारित कहानी, कविता, लघुकथा विधा की अनेक पुस्तकें प्रकाशित। अनेक सम्मान एवं पुरस्कारों से सम्मानित। कथा सागर त्रैमासिक तथा हमसफर अर्द्धवार्षिक का संपादन। संप्रति: कार्मिक प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग झारखंड सरकार अन्तर्गत कार्यरत।
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Vivek Ranjan ‘Vivek’ is a distinguished Hindi writer, novelist, and poet, born on 16 May 1963 in Jabalpur, Madhya Pradesh, India. He is the son of Late Smt. Shyama Pandey and Late Shri Ram Raj Pandey. He proudly carries a rich intellectual lineage as the maternal grandson of the legendary Hindi scholar Acharya Hazari Prasad Dwivedi and the eminent Ayurvedic authority Acharya Vishwanath Dwivedi. Honoured with the Vidya Vachaspati Saraswat Award by Vikram Shila Hindi University, Vivek Ranjan ‘Vivek’ has made a significant contribution to contemporary Hindi literature across multiple genres. His published works include acclaimed novels such as Gulmohar Ki Chhanv, Lovleen, Abhiyan, Neel Nadi Ke Kaale Saaye, Chal, Bairagi Man Devprayag, and Sagar Paar Seep Ko Moti. His literary repertoire also features the short story collection Boonden Amrit Ki Milen and poetry collections Main Sapan Ke Suman Chunta and Ab To Mausam Bhi Hai Mera. Alongside his creative writing, he is the author of the academic book Cement Quality Control in Semi Dry Process. A postgraduate in Chemistry, Vivek Ranjan ‘Vivek’ has devoted over four decades to the field of cement quality control. His professional journey extends beyond India to countries including Nepal, Botswana, Ethiopia, Brazil, and Tanzania. Blending scientific discipline with literary sensitivity, Vivek Ranjan ‘Vivek’ represents a rare synthesis of technology and creativity—an author whose work reflects both experiential depth and artistic refinement.
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युवा साहित्यकार बिश्नोई समकालीन हिंदी साहित्य में एक संवेदनशील और प्रभावशाली रचनाकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। वे उन लेखकों में हैं जो जीवन के वास्तविक अनुभवों को शब्दों में ढालकर पाठकों के मन तक सीधे पहुँचते हैं। अब तक उन्होंने दो कहानी संग्रहों का लेखन, छह सांझा कहानी संग्रहों में सक्रिय सहभागिता और एक पर्यावर्णीय पुस्तक का संपादन भी किया है, जिससे उनकी साहित्यिक दृष्टि और विषय चयन की गंभीरता स्पष्ट होती है। उनकी निरंतर सृजनशीलता और साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है।
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मनुष्य जीवन और काव्य दोनों ही साथ-साथ चलते हुए परिवर्तनशील और गतिशील समाज की परिस्थितियों और प्रवृत्तियों से प्रभावित होते हैं और मैं भी इसका अपवाद नहीं हूँ। अपनी इन्हीं भावनाओँ और कल्पनाओं की उड़ान को शब्द देना और सृजन करना अत्यंत रुचिकर और सरल प्रतीत होता था, पर जब उन्हीं भावों को वर्णिक और मात्रिक छंदों के कठिन नियमों ,लय ,शिल्प,और रस से अलंकृत कर बांधने का प्रयास किया तो अभूतपूर्व आनंद की प्राप्ति और संतुष्टि हुई और छंद बद्ध सृजन आरम्भ किया। आचार्य पिंगल ऋषि की धरोहर और अपनी सांस्कृतिक विरासत को सँभालने का मुझ अकिंचन ने एक प्रयास किया है। छंद विधान के अथाह सागर में डूब कर जब कुछ छंद रत्नों पर अपनी लेखनी चलाई ,तो इस बात का विशेष ध्यान रखा कि देशज शब्दों का प्रयोग मात्रा गणना और मापनी के लिए न करना पड़े और भाषा ऐसी हो जो सामान्य पाठक के हृदय तक सहजता से पहुँच सके तथा भाषा का मान-सम्मान और गरिमा बनी रहे इसलिए शुद्ध वर्तनी से सजी हिंदी के सरल और परिष्कृत शब्दों का प्रयोग किया है ।
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